All-India Campaign against Anti-People FCA Rules, 2022



As you know the new Forest (Conservation) Rules 2022 are pending in Parliament and may be passed any day in the Budget session. It is very important that we all come together to strongly oppose these Rules and persuade Members of the Parliament (MPs) to oppose it in Parliament. These Rules will allow easy diversion of forest land for projects and companies without the consent of Gram Sabhas and will allow the eviction of forest communities without the recognition of forest rights.

The Modi Government has speeded up the process of handing over our land, water and forests to corporate interests. Currently, around 25000-30000 hectares of forest land are being diverted every year and forest communities are being evicted as a result. The Modi Government has even floated a consortium of corporate interests to identify how forest laws should be modified to facilitate “ease of business” in forest areas. Meanwhile, as we all well know, The Forest Rights Act (FRA)  is not being implemented, claims are being illegally rejected or are not being processed while forest people continue to be violently and illegally evicted from forest land. It appears that this is a deliberate policy, since if rights are not recognised, forest communities can be more easily evicted and their land and forests snatched from them.

The Rules of 2022 clearly show this intention. The earlier Rules of 2003 (amended in 2014 and 2017) required free and informed consent of Gram Sabhas as well as the completion of the process of recognition of forest rights before ‘in principle’ Stage 1 clearance for forest diversion, along with certification from the District Collector to this effect [Rule 6 (e) and (f)]. These provisions have been totally removed. In fact, now even ‘Final Approval,’ Stage 2 clearance is to be given without recognising forest rights or getting the consent of Gram Sabhas. In these 2022 Rules the Central Government will give ‘Final Approval’ once the user agency completes documentation, pays “Compensatory Levies” and land for “Compensatory Afforestation” has been handed over to the District Forest Officer. Only after this ‘Final Approval’ is the State Government supposed to ensure completion of the FRA processes and consent of Gram Sabhas.

Quite obviously, once the Central Government has given Final Approval, there will be no pressure to complete FRA processes. Lakhs of forest dwellers can be easily evicted as “encroachers” without even any rehabilitation or compensation. Also, there are detailed provisions for “compensatory afforestation” which, as we know, will result in even more evictions. Also once Final Approval has been given and “compensatory” money and land have been handed over, it will be practically impossible for any Gram Sabha will to resist giving consent or even seek modification to the terms of diversion.

These Rules completely violate the provisions of the Forest Rights Act which empowers Gram Sabhas to protect their forests, habitat and water sources (section 5) and undertake the verification of rights (section 6). They violate the provisions of The Provisions of the Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act, 1996 or PESA which empower Gram Sabhas to manage and protect all community resources and prevent alienation of Adivasi land. They violate the provisions of the new The Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013 (LARR Act 2013) which require mandatory consent of Gram Sabhas in Scheduled Areas before land acquisition and their involvement in the formulation of rehabilitation schemes. The National Commission for Scheduled Tribes (NCST) has also very strongly objected to these Rules as violative of the FRA in a detailed letter to Environment Minister, Shri Bhupender Singh. It has recommended that these Rules be held in abeyance, and instead the old Rules regarding recognition of forest rights and consent of Gram Sabhas be strengthened. However in a very curt reply, the Minister has dismissed all the objections of the NCST without even addressing them properly. These Rules also allow forest land to be included in the infamous Land Banks that are being made for corporate takeover of land. A mechanism called Accredited Compensatory Afforestation which private interests can use in lieu of compensatory afforestation has also been introduced in these Rules. This allows plantation alongside and even within designated National Parks, Sanctuaries and Tiger Reserves. It also allows plantations on non-forest land from which communities have been “relocated”, thus providing an incentive for “relocation”. Business interests are thus provided backdoor entry into forests!

These Rules clearly show that the Modi Government is determined to sweep aside all laws for the protection of forest communities and the rights of Gram Sabhas, as well as for forest conservation in order to ease the diversion of forest resources to corporate interests and destructive projects. We must fight this tooth and nail, both to protect peoples’ rights over natural resources and to protect livelihoods, as well as to protect our environment and our ‘Jal Jangal Jameen’ from destructive corporate greed. To this end we need to:

  • Immediately mobilise in large numbers to strongly oppose these Rules, which are now in
  • Parliament and may be passed any day
  • Urge MPs to raise this issue in Parliament and strongly oppose these Rules
  • Urge MLAs also to oppose these Rules
  • Mobilise the press and public opinion against this blatant anti-people, anti- environment measure


वन संरक्षण नियम 2022 वापस लो!

वन अधिकार अधिनियम और ग्राम सभाओं के अधिकारों का हनन बंद करो ! कॉर्पोरेट को हमारे जंगल देना बंद करो! हमारे जल, जंगल, जमीन, जीविका की रक्षा करो!

प्रिय साथियों,

जैसा कि आप जानते हैं, नए वन (संरक्षण) नियम 2022 संसद में लंबित हैं और बजट सत्र में किसी भी दिन पारित किए जा सकते हैं। बहुत ज़रूरी है कि हम सब मिलकर इन नियमों का पुरजोर विरोध करें और सांसदों को संसद में इसका विरोध करने के लिए भी राजी करें, और व्यापक जनमत बनाएँ। इन नियमों से वन भूमि को वन समुदायों से छीन कर ज़्यादा आसानी से परियोजनाओं और कंपनियों को सौंपे जा सकेंगे, लाखों लोग ज़्यादा आसानी से बेदखल किए जा सकेंगे, वनों पर ग्राम सभाओं के अधिकार छीने जाएंगे। क्योंकि अब वन अधिकार कानून के प्रक्रियाओं को पूरे किए बिना ही और ग्राम सभा के अनुमति के बिना ही अब वन भूमि का हस्तांतरण किसी भी कंपनी या परियोजना को किया जा सकेगा। अभी तक के नियमों में हस्तांतरण के प्रारम्भिक सैद्धान्तिक सहमति के चरण के पहले ही कलेक्टर को प्रमाणित करना था की वन अधिकार दावों का निराकरण हो चुका है और ग्राम सभा ने पूरे मामले को अच्छे से समझ कर सहमति दिया है। परंतु 2022 के नए नियमों में ये दो शर्त हटा दिये गए हैं।

जैसा कि आप जानते हैं कि मोदी सरकार ने हमारी जमीन, पानी और जंगल कंपनियों और उनके फायदे के परियोजनाओं को सौंपने की प्रक्रिया तेज कर दी है। वर्तमान में, लगभग 25,000-30,000 हेक्टेयर (60,000-75,000 एकड़) वन भूमि हर साल हस्तांतरित किया जा रहा है और परिणामस्वरूप वन समुदायों को बेदखल किया जा रहा है। मोदी सरकार ने लॉक डाउन के दौरण कंपनियों के फ़ायदे के लिए वन क़ानूनों में बदलाव लाने के लिए एक घोषित प्रक्रिया भी शुरू कर दिया था और इसके लिए बड़े कंपनियों को एक consortium (समूह) में जुडने के लिए आमंत्रण भी दिया था। दूसरी ओर, जैसा कि हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं, वन अधिकार कानून को लागू नहीं किया जा रहा है, दावों को अवैध रूप से खारिज किया जा रहा है या उनका सत्यापन रुका हुआ है, और वन समुदायों को हिंसक और अवैध रूप से वन भूमि से बेदखल किया जा रहा है। यह साफ हो चुका है कि वन अधिकार कानून की प्रक्रियाएं जान बूझकर कर रोके रखे गये हैं क्योंकि यदि अधिकारों को मान्यता ही नहीं दी जाती है, तो वन समुदायों को ज़्यादा आसानी से बेदखल किया जा सकता है और उनकी भूमि और जंगल उनसे छीन लिए जा सकते हैं।

2022 के नियम इस मंशा को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। पहले के नियम – वन संरक्षण नियम 2003 (2014 और 2017 में संशोधित)- में ‘सैद्धांतिक’ रूप से वन हस्तांतरण (डायवर्ज) के लिए प्राथमिक स्वीकृति देने से पहले ग्राम सभाओं को पूरी जानकारी दिये जाने और उस पर उनका मंथन के आधार पर सहमति लिया जाना अनिवार्य था, और यह भी अनिवार्य था कि वन अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया को पूरा किया जाए। जिला कलेक्टर को प्रमाणित करना था कि ये दोनों शर्त पूरे हुए हैं (नियम 6(ई),(एफ))। परंतु 2022 के नियमों में इन प्रावधानों को पूरी तरह से हटा दिया गया है। अब वन अधिकार को मान्यता दिए बिना या ग्राम सभाओं की सहमति प्राप्त किए बिना ही प्राथमिक और अंतिम स्वीकृति दिया जा सकेगा। इन 2022 नियमों के अनुसार, “प्रतिपूरक वनीकरण” (क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण) और के लिए भूमि तय होने के बाद और “प्रतिपूरक उदग्रहण” (क्षतिपूर्ति शुल्क) और सभी ज़रूरी दस्तावेज़ जमा होने पर केंद्र सरकार ‘अंतिम स्वीकृति’ दे ही देगी। इस ‘अंतिम स्वीकृति’ के बाद ही राज्य सरकार को वन अधिकार के प्रक्रियाओं को पूरा करना और ग्राम सभाओं की सहमति सुनिश्चित करना होगा।

जाहिर है, केंद्र सरकार द्वारा अंतिम स्वीकृति दिए जाने के बाद, वन अधिकार प्रक्रियाओं को पूरा करने का कोई दबाव नहीं होगा। लाखों परिवारों को बिना किसी पुनर्वास या मुआवजे के “अतिक्रामक” बता कर आसानी से बेदखल किया जा सकेगा। इसके अलावा, इन नियमों में “प्रतिपूरक वनीकरण” (प्लांटेशन) के लिए विस्तृत प्रावधान हैं, जिसके परिणामस्वरूप, और भी कई गुना परिवार बेदखल होंगे, जैसा कि हम सब अच्छी तरह जानते हैं।

साथ ही स्पष्ट है कि एक बार जब अंतिम स्वीकृति दे दी जाती है और “क्षतिपूर्ति” धन और भूमि सौंप दी जाती है, तो किसी भी ग्राम सभा के लिए सहमति देने से मना करना या डायवर्जन की शर्तों में संशोधन की मांग करना व्यावहारिक रूप से लगभग असंभव होगा।

ये नए नियम वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों का पूरी तरह से उल्लंघन करते हैं जो ग्राम सभाओं को उनके गाँव, वनों और जल स्रोतों की रक्षा करने और विनाशकारी कार्यों को रोकने का अधिकार देता है (धारा 5) तथा वन अधिकारों को मान्यता दिलवाने की शक्ति देता है (धारा 6)। वे ‘पेसा’ कानून के प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं जो ग्राम सभाओं को सभी सामुदायिक संसाधनों का प्रबंधन और सुरक्षा करने, और आदिवासी भूमि के हस्तांतरण को रोकने का अधिकार देता है। वे नए भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 के प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं, जिसके तहत भूमि अधिग्रहण से पहले अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं की सहमति अनिवार्य है और पुनर्वास योजनाओं में ग्राम सभाओं की भागीदारी को आवश्यक बताते हैं।

“राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग” ने भी पर्यावरण मंत्री श्री भूपेंद्र सिंह को एक लंबे पत्र में इन नियमों से वन अधिकार अधिनियम के उल्लंघन का विवरण देते हुए इन नियमों पर कड़ी आपत्ति जताई है। आयोग ने सिफारिश की है कि इन नियमों को फिलहाल स्थगित किया जाए और इनके बजाय वन अधिकारों की मान्यता और ग्राम सभाओं की सहमति के पुराने नियमों को और मजबूत किया जाए। आयोग ने यह भी कहा है कि “वन संरक्षण” के कानूनी प्रावधानों को “वन अधिकार” के कानूनी प्रावधानों के साथ जोड़ कर ही चलाया जाना ज़रूरी है, ये अलग अलग धाराएँ नहीं हैं।

परन्तु एक बहुत ही संक्षिप्त उत्तर में, आयोग के विस्तृत आपतियों और सिफ़ारिशों पर प्रासंगिक जवाब दिये बिना ही, पर्यावरण मंत्री ने आयोग की सभी आपत्तियों और सिफ़ारिशों को खारिज कर दिया है।

ये नियम वन भूमि को उस खतरनाक “लैंड बैंक” (भूमि बैंक) व्यवस्था में शामिल करने की भी अनुमति देते हैं, जो भूमि के कंपनियों को सौंपने के लिए बनाए जा रहे हैं।

इन नए नियमों में “प्रत्यायित प्रतिपूरक वनीकरण” नामक एक व्यवस्था को भी जोड़ा गया है, जिस से निजी वनीकरण या प्लांटेशन को “प्रतिपूरक वनीकरण” माना जा सकेगा। यह राष्ट्रीय उद्यानों, अभयारण्यों और टाईगर रीज़र्व के लिए चयनित क्षेत्रों में भी हो सकता है! राष्ट्रीय उद्यान और अन्य संरक्षित वन क्षेत्र के कारण विस्थापित किए गए गाँव के भूमि पर भी ऐसा निजी प्लांटेशन किया जा सकता है, यानि इस भूमि के व्यवसायिकरण की संभावना बनने से ये गाँव ज़्यादा संख्या में उजाड़े जाएंगे। इस तरह “वनीकरण” के नाम पर कंपनियों को पिछले दरवाजे से वनों में घुसाया जा रहा है!

ये वन संरक्षण नियम 2022 स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि मोदी सरकार वन समुदायों के अधिकार, ग्राम सभाओं के अधिकारों और वन संरक्षण को भी कॉर्पोरेट हितों और विनाशकारी परियोजनाओं के लिए बलि चड़ाने के लिए तत्पर है और इस कंपनी राज के लिए सभी संबन्धित कानूनों को दरकिनार करने या बदलने के लिए संकल्पित है!

प्राकृतिक संसाधनों पर लोगों के अधिकारों की रक्षा करने और आजीविका की रक्षा करने के साथ-साथ हमारे पर्यावरण और हमारे जल, जंगल, जमीन को विनाशकारी कॉर्पोरेट लालच से बचाने के लिए, हमें मजबूती से लड़ना चाहिए !

इसके लिए हम:

  • बड़े पैमाने पर इन नियमों के खिलाफ तीव्र जन आंदोलन करें , जल्दी करें क्योंकि ये नियम अभी संसद में हैं और किसी भी दिन पारित हो सकते हैं, इसलिए तुरंत बड़ी संख्या में लामबंद हों।
  • संसद में इस मुद्दे को असरदार तरीके से उठाने के लिए और इन नियमों का पुरजोर विरोध करने के लिए सांसदों को प्रेरित करें
  • विधायकों से भी इन नियमों का विरोध करने का आग्रह करें । क्योंकि ये नियम पारित हो गए तो भुगतना तो सबको पड़ेगा।
  • इस घोर जन-विरोधी, पर्यावरण-विरोधी प्रस्ताव के खिलाफ जनमत बानाने प्रैस और अन्य प्रभावशाली समूह और व्यक्तियों को लामबंद करें।